घुघुतिया त्यौहार, मकर संक्रांति // कुमाऊँ का प्रसिद्ध त्यौहार

भारत एक विविध संस्कृति का देश है। यहां स्थान स्थान केसाथ  अनेक प्रकार के त्योहार मनाये जाते हैं। इन्हीं स्थानों में भारत का एक विविध संस्कृति विरासतों से धनी राज्य आता है उत्तराखंड। आज हम उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में मनाए जाने वाले एक विशेष त्यौहार "घुघुतिया" के बारे में आपको बता रहे हैं। पूरा लेख ध्यान से पढ़ें और जानें इस त्योहार के बारे में।


         उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में यह त्यौहार मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है। इस त्योहार को उत्तराखंड में उत्तरायणी के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि इस दिन से सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की और घूमने लगता है। 

गढ़वाल में इसे खिचड़ी संक्रांति के नाम से जाना जाता है। यह एक लोकोत्सव है। इस दिन एक विशेष प्रकार का व्यंजन बनाया जाता है जिसका नाम है "घुघुत" , इसी कारण इसे घुघुतिया त्यार भी कहते हैं। कई त्यौहार हैं जो किसी विशेष पशु पक्षियों के लिए मनाये जाता हैं, परंतु कुमाऊं में मनाया जाने वाला यह त्यौहार कौवों को विशेष भोजन करने का त्यौहार है। इस दिन सुबह सुबह उठकर बच्चे कौवे को पकवान खाने को बुलाते हैं और यह लोकोक्ति गाते हैं -

"काले कौवा काले, घुघुती माला खाले,

ले कौवा बड़ा, हमुन के दिये सुनु घड़ा ।"

इसका अर्थ यह है कि - काले कौवा आओ, और यह घुघुते का पकवान खाओ, इसके साथ यह बड़ा (उरद की दाल का पकवान) भी खाओ और हमको एक सोने का घड़ा लेकर दो। 



घुघुतिया त्यौहार मनाने के पीछे एक लोककथा है | जब कुमाऊं में चंद वंश  के राजा राज करते थे , तो उस समय एक राजा थे कल्याण चंद । जिनकी कोई संतान नहीं थी,संतान ना होने के कारण राजा और रानी चिन्तित रहते थे | उनका लालची मंत्री यह सोचता था कि जब राजा की मृत्यु होगी तो यह सारा राज्य उसका हो जाएगा | एक बार राजा कल्याण चंद अपनी पत्नी के साथ बागनाथ मंदिर (बागेश्वर)  के दर्शन के लिए गए और संतान प्राप्ति के लिए मनोकामना करी और कुछ समय बाद राजा कल्याण चंद को पुत्र की प्राप्ति हुई  , जिसका नाम उन्होंने “निर्भय चंद” रखा | रानी अपने पुत्र को प्यार से “घुघती” के नाम से बुलाती थी और उन्होंने अपने पुत्र के गले में “मोती की माला” पहनाई थी | मोती की माला से निर्भय का विशेष लगाव हो गया था इसलिए उनका पुत्र जब कभी भी किसी वस्तु की हठ करता तो रानी अपने पुत्र निर्भय को कहती थी कि -

 “हठ ना कर नहीं तो तेरी माला कौओ को दे दूंगी” | 

उसको डराने के लिए रानी

 “काले कौआ काले घुघुती माला खाले” 

बोलकर डराती थी | ऐसा करने से कौऐ आ जाते थे और रानी कौओ को खाने के लिए कुछ दे दिया करती थी | धीरे धीरे निर्भय और कौओ की दोस्ती हो गयी | दूसरी तरफ मंत्री घुघुती(निर्भय) को मार कर राज पाट हडपने की उम्मीद लगाये रहता था |


एक दिन मंत्री ने अपने साथियो के साथ मिलकर एक षड्यंत्र रचा | घुघुती (निर्भय) जब खेल रहा था तो मंत्री उसे चुप चाप उठा कर ले गया | जब मंत्री घुघुती (निर्भय) को जंगल की ओर ले जा रहा था तो एक कौए ने मंत्री और घुघुती(निर्भय) को देख लिया और जोर जोर से कॉव-कॉव करने लगा | यह शोर सुनकर घुघुती रोने लगा और अपनी मोती की माला को निकालकर लहराने लगा | उस कौवे ने वह माला घुघुती(निर्भय) से छीन ली | उस कौवे की आवाज़ को सुनकर उसके साथी कौवे भी इक्कठा हो गए एवम् मंत्री और उसके साथियो पर नुकली चोंचो से हमला कर दिया | हमले से घायल होकर मंत्री और उसके साथी मौका देख कर जंगल से भाग निकले |


राजमहल में सभी घुघुती(निर्भय) के ना मिलने से परेशान हो गए थे | तभी एक कौवे  ने घुघुती(निर्भय) की मोती की माला रानी के सामने फेंक दी | यह देख कर सभी को संदेह हुआ कि कौवे को घुघुती(निर्भय) के बारे में पता है इसलिए सभी कौवे के पीछे जंगल में  पहुंचे और उन्हें वहां निर्भय मिल गया | जब राजा को यह पता चला कि उसके पुत्र को मारने के लिए मंत्री ने षड्यंत्र रचा है तो राजा ने मंत्री और उसके साथियों को मृत्यु दंड दे दिया |


 घुघुती के मिल जाने पर रानी ने बहुत सारे पकवान बनाये और घुघुती से कहा कि अपने दोस्त कौवो को भी बुलाकर खिला दे और यह कथा धीरे धीरे सारे कुमाऊँ में फैल गयी और तब से हर साल इस दिन धूम धाम से इस त्यौहार को मनाया जाता है | इस दिन मीठे आटे से पकवान बनाये जाते हैं जिसे “घुघुत” भी कहा जाता है | उसकी माला बनाकर बच्चों द्वारा कौवों को बुलाया जाता है ।




तो ये है घुघुतिया त्यौहार की विशेष कथा, आपको यह जानकारी कैसी लगी अवश्य बताएं। इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगों को शेयर करें ताकि अधिक से अधिक लोगों तक यह जानकारी पहुंच सके।





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