जैव प्रक्रियाएँ // Life Processes (Part-04) जीवों में श्वसन

 श्वसन (Respiration)


भोजन से ऊर्जा मुक्त करने की क्रिया श्वसन कहलाती है। 

श्वसन की प्रक्रिया में , कोशिकाओं के अंदर ऑक्सीजन ग्रहण करना , भोजन का ऑक्सीकरण कर ऊर्जा मुक्त करना, और फिर शरीर से कार्बनडाई ऑक्साइड को बाहर निकाल देना शामिल है।

जीवन के लिए श्वसन परमावश्यक है,क्योकि श्वसन से जीवधारियों के शरीर में जीवित रहने हेतु जो भी क्रियाएं होती हैं उनके लिए ऊर्जा मिलती है। 


श्वसन के प्रकार - 


ऑक्सीजन की उपलब्धता के आधार पर श्वसन दो प्रकार का होता है-

1- वायवीय श्वसन 

2- अवायवीय श्वसन



1- वायवीय श्वसन ( Aerobic Respiration) -- श्वसन जो ऑक्सीजन के प्रयोग द्वारा होता है, वायवीय श्वसन कहलाता है। वायवीय श्वसन में ग्लूकोज पूर्ण रूप से कार्बनडाई ऑक्साइड और जल में टूट जाता है,जिसमे अत्यधिक ऊर्जा निकलती है। ग्लूकोज के एक अणु के टूटने से 38 ATP ऊर्जा के अणु बनते हैं। वायवीय श्वसन माइटोकांड्रिया में सम्पन्न होता है।


2- अवायवीय श्वसन ( Anaerobic Respiration) --  श्वसन जो बिना ऑक्सीजन के होता है, अवायवीय श्वसन कहलाता है। इस प्रकार का श्वसन मुख्य रूप से जीवाणु में होता है। जीवाणु ग्लूकोज को एथनॉल तथा कार्बनडाई ऑक्साइड में तोड़कर ऊर्जा मुक्त करते हैं। इसमें वायवीय श्वसन की तुलना में बहुत कम ऊर्जा मुक्त होती है। ग्लूकोज के एक अणु से केवल 2ATP ऊर्जा ही प्राप्त होती है।




पौधों में श्वसन ( Respiration in Plants )


जंतुओं के समान ही पौधों को भी अपने कोशिकीय उपापचयी कार्यों को सम्पन्न करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जिसके लिए पौधों में भी श्वसन की क्रिया होती है। जंतुओं के समान ही पौधे भी श्वसन में ऑक्सीजन प्रयोग करते हैं और कार्बनडाई ऑक्साइड मुक्त करते हैं। पौधे के सभी भागों (जड़, तना, पत्ती) सभी श्वसन क्रिया में भाग लेते हैं। और पौधों में श्वसन दर बहुत धीमी गति से होता है। स्टोमेटा के द्वारा गैसों का विनिमय करके पौधे श्वसन करते हैं। दिन के समय श्वसन में बनने वाली कार्बनडाई ऑक्साइड ,पौधे द्वारा प्रकाश संश्लेषण में प्रयुक्त कर ली जाती है, तथा केवल ऑक्सीजन वायुमंडल में छोड़ी जाती है। परंतु रात्रि के समय जब प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं होती है तो पुढ़े ऑक्सीजन ग्रहण कर कार्बोंड ऑक्साइड को ही बाहर छोड़ते हैं। 



जंतुओं में श्वसन (Respiration in Animals)


अमीबा में श्वसन- अमीबा एककोशिकीय प्राणी है। इसलिए यह साधारण विसरण द्वारा ही गैसों का आदान प्रदान कर श्वसन कर लेता है। एककोशिकीय प्राणी सामान्य रूप से कोशिका झिल्ली द्वारा ही सांस लेते हैं। 


मछली में श्वसन - मछली में श्वसन हेतु गलफड़े, क्लोम होते हैं। मछलियों द्वारा मुँह में पानी भरकर क्लोम की ओर छोड़ा जाता है, जहां क्लोम की दीवारें पानी में घुली ऑक्सीजन को अवशोषित कर लेती हैं। 



मानव में श्वसन- 


मानव में श्वसन हेतु पूरा एक तंत्र विकसित है। मानव के श्वसन तंत्र में मुख्य रूप से नाक, नासाद्वार  , नासिक गुहा, श्वांसनली, श्वासनियाँ, फुफ्फुस या फेफड़े, और डायफ्राम होता है। 

वायु हमारे नासाद्वार से प्रवेश करती हुई फेफड़ों तक पहुंचती है। फेफड़ों में प्रत्येक श्वसनी विभाजित होकर छोटी छोटी अनेक नलिकाएँ बनाती है। जिनके अंतिम सिरे थैलीनुमा वायुकोष बनाती हैं, जिन्हें कूपिकाएँ कहते हैं। कूपिकाएँ वह स्थल उपलब्ध कराती हैं जिसमे से गैसों का आदान प्रदान होता है। जब हम सांस द्वारा वायु अंदर लेते हैं तो डायाफ्राम और पेशियॉं सिकुड़ती हैं। वक्षगुहा का आयतन बढ़  जाता है। कूपिकाएँ ऑक्सीजन को अवशोषित करके रक्त तक पहुंचती हैं। जहां श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के साथ जुड़कर उसे शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचा देता है। विभिन्न कोशिकाओं से कार्बनडाई ऑक्साइड रक्त में विलेय अवस्था में कूपिकाओं तक आती है और वहां से शरीर से बाहर विसर्जित कर दी जाती है। इस प्रकार मनुष्य में श्वसन का यह क्रम चलता रहता है। 





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