एक गुफा का अनोखा रहस्य

भगवान शिव ने क्रोध के आवेश में गजानन का जो मस्तक शरीर से अलग किया था, वह उन्होंने इस गुफा में रखा था 

🚩 पाताल भुवनेश्वर 🚩


👉🏿 उत्तराखण्ड राज्य  के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट नगर से 14 किमी दूरी पर स्थित पाताल भुवनेश्वर चूना पत्थर की एक प्राकृतिक गुफा  है। इस गुफा में धार्मिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कई प्राकृतिक कलाकृतियां स्थित हैं। यह गुफा भूमि से 90 फ़ीट नीचे है, तथा लगभग 160वर्ग मीटर क्षेत्र में विस्तृत है।

👉🏿इस गुफा की खोज सर्वप्रथम  राजा ऋतुपर्णा ने की थी, जो सूर्य वंश के राजा थे और त्रेता युग में अयोध्या पर शासन करते थे। स्कंदपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं। यह भी वर्णन है कि राजा ऋतुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में प्रविष्ट हुए तो उन्होंने इस गुफा के भीतर महादेव शिव सहित 33 कोटि देवताओं के साक्षात दर्शन किये थे। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु आदि शंकराचार्य का 822 ई के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया।

👉🏿गुफा के अंदर जाने के लिए लोहे की जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है यह गुफा पत्थरों से बनी हुई है इसकी दीवारों से पानी रिस्ता रहता है जिसके कारण यहां के जाने का रास्ता बेहद चिकना है। गुफा में शेष नाग के आकर का पत्थर है उन्हें देखकर एेसा लगता है जैसे उन्होंने पृथ्वी को पकड़ रखा है। इस गुफा की सबसे खास बात तो यह है कि यहां एक शिवलिंग है जो लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में शिवलिंग की ऊंचाई 1.50 फीट है और शिवलिंग को छूने की लंबाई तीन फीट है । यहां शिवलिंग को लेकर ऐसा कहा जाता है कि जब यह शिवलिंग गुफा की छत को छू लेगा, तब दुनिया खत्म हो जाएगी। संकरे रास्ते से होते हुए इस गुफा में प्रवेश किया जा सकता है।

👉🏿आपको यहाँ पर पाताल भुवनेश्वर पर एक विस्तृत लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ  जो श्री राम के पूर्वजों ने यह गुफा  खोजी थी , जो भारतवर्ष के पवित्रतम तीर्थों में  पाताल भुवनेश्वर भगवान श्री भुवनेश्वर की महिमा एवं अलौकिक गाथा का एक साकार स्वरूप है।  यह गुफा वास्तव में अद्भुत, चमत्कारी एवं अलौकिक है। यह पवित्र गुफा जहां अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है, वहीं अनेकानेक रहस्यों से भरपूर है। इस गुफा को पाताल लोक का मार्ग भी कहा जाता है। सच्ची श्रद्वा व प्रेम से इसके दर्शन करने मात्र से ही हजारों हजार यज्ञों तथा अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है और विधिवत पूजन करने से अश्वमेघ यज्ञ से दस हजार गुना अधिक फल प्राप्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त पाताल भुवनेश्वर का स्मरण और स्पर्श करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि तैतीस कोटि देवता भगवन भुवनेश्वर की अखण्ड उपासना हेतु यहां निवास करते हैं तथा यक्ष, गंधर्व, ऋषि-मुनि, अपसराएं, दानव व नाग आदि सभी सतत पूजा में तत्पर रहते हैं तथा भगवान भुवनेश्वर की कृपा करते हैं।

👉🏿स्कन्द पुराण के मानस खण्ड में भगवान श्री वेदव्यास जी ने इस पवित्र स्थल की अलौकिक महिमा का बखान करते हुए कहा है- भुवनेश्वर का नामोच्चार करते ही मनुष्य सभी पापों के अपराध से मुक्त हो जाता है तथा अनजाने में ही अपने इक्कीस कुलों का उद्धार कर लेता है। इतना ही नहीं अपने तीन कुलों सहित शिवलोक को प्राप्त करता है। इसे सृष्टि की अद्भुत कृति बताते हुए श्री वेदव्यास जी आगे कहते हैं कि इस पवित्र गुफा की महिमा और रहस्य का वर्णन करने में ऋषि-मुनि तपस्वी तो क्या देवता भी स्वयं को असमर्थ पाते हैं। ब्रह्माण्ड के समान ही यह गुफा भी अनन्त रहस्यों से सम्पूर्ण है।
पाताल भुवनेश्वर को बाल भुवनेश्वर भी कहा जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने यहां बाल रूप में प्राणी मात्र के कल्याण हेतु सहस्त्रों वर्षों तक तप किया था। पाताल भुवनेश्वर गुफा से लगभग 200 मी. पहले भगवान वृद्ध भुवनेश्वर का प्राचीन मंदिर भी अवस्थित है जो अपने आप में हजारों हजार सदियों का इतिहास, धर्म एवं सनातन संस्कृति के साथ ही दिव्य कलाओं को समेटे हुए है। बाल भुवनेश्वर के दर्शन से पूर्व वद्ध भुवनेश्वर के दर्शन जरूरी माने जाते हैं।
गुफा के भीतर प्रवेश करते ही सर्वप्रथम नृसिंह भगवान की मूर्ति के दर्शन होते हैं। 82 सीढयां उतरकर जंजीरों के सहारे 90 फुट नीचे प्रथम तल में पहुंचा जाता है और एक अद्भुत किन्तु सुखद आभास होने लगता है।

👉🏿 जहां-जहां दृष्टि जाती है वहीं कोई न कोई दिव्य मूर्ति, कलाकृति के दर्शन होने लगते हैं। ऐसा लगता है मानो सृष्टि नियंता भगवान ब्रह्मा जी ने किसी विशेष कल्याणकारी प्रयोजन हेतु यहां एक अलौकिक सृष्टि रची हुई है। अष्ट धातुनुमा विचित्र चट्टानों पर उकेरी गई आकर्षक एवं जीवन्त कलाकृतियां धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, शक्ति, भक्ति, आध्यात्म, संस्कृति, इतिहास तथा सनातन मर्यादा का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती हैं।

👉🏿कहा जाता है कि इस गुफा से पाताल से नीचे की ओर कुल सात तल यानि लोक स्थित है, परन्तु दर्शन-पूजन, यज्ञ-हवन इत्यादि के लिए प्रथम तल के बाद नीचे उतरने की अनुमति नहीं है। प्रथम दृष्टि में तो यह सुरक्षा कारण ही माना जाता है किन्तु धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कठिन भक्ति, जप-तप, अनुष्ठान इत्यादि से भुवनेश्वर की विशेष कृपा प्राप्त सिद्ध-योगी को ही ऐसा सौभाग्य मिलता है। आदि जगद्गुरू शंकराचार्य ने गंगोलीहाट स्थित महाकाली दरबार के दर्शन के पश्चात जब यहां आकर भगवन भुवनेश के दर्शन किये तो स्वयं को धन्य कहा। इस गुफा के प्रथम तल में विचरण करते हुए जगद्गुरू ने अखिल ब्रह्माण्ड में विद्यमान देवी-देवताओं, भूमण्डल के सभी पवित्र तीर्थों, देवगणों तथा क्षेत्रपालों को एक साथ भुवनेश्वर के चरणों में ध्यानस्थ देखकर कहा कि इस महानतम तथा श्रेष्ठतम तीर्थ के दर्शन जन्म जन्मान्तरों के पुण्य कर्मों के बाद भी दुर्लभ हैं। शंकराचार्य को भगवान भुवनेश के दर्शन महाकाली की प्रेरणा तथा कृपा से ही संभव हो पाये थे। यहां श्री भुवनेश्वर तथा सभी देवी-देवताओं की विधिवत पूजा-अर्चना के पश्चात अंततः इस परम शक्ति को कीलित किया। साथ ही लोक कल्याण की दृष्टि से भगवान भुवनेश्वर की पूजा करने-कराने का दायित्व समीपवर्ती गांव के निवासियो को सौंप गये।गुफा के प्रथम तल में सर्वप्रथम शेषनाग के विशाल फन तथा उसके विषकुण्ड के दर्शन होते हैं। यहां शेषनाग क्षेत्रपाल के रूप में विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि क्षेत्रपाल की अनुमति बिना भगवान भुवनेश के दर्शन के संभव नहीं हैं। 

👉🏿स्कंद पुराण के मानस खण्ड में एक कथा प्रसंग के अनुसार राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए इसी स्थान पर एक अद्भुत यज्ञ किया था। कथा के अनुसार एक बार राजा परीक्षित ने प्रहसन भाव में श्रृंगी ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया। इस पर ऋषि पुत्र उलंग को बहुत क्रोध आ गया और उन्होंने राजा को सांप के डंसने से मृत्यु का श्राप दे दिया। अपने बचाव के लिए तब राजा ने एक विचित्र यज्ञ का आयोजन कर डाला और सम्पूर्ण भूतल व पाताल में मौजूद सांपों-नागों का हवन कर दिया। परन्तु तक्षत नाग देवराज इन्द्र के आसन के नीचे छुप गया। इन्द्र का यज्ञ चल रहा था, परीक्षित को भी निमंत्रण था। वहां तक्षत नाग ने राजा परीक्षित को डस कर उनके प्राण हर लिये। घटना के सात दिन बाद कलयुग आरंभ हुआ, फिर परीक्षित की मृत्यु हुई। शेषनाग की रीड की हड्डियां यहीं से समूची पृथ्वी के भीतर फैली बतायी जाती हैं।

👉🏿कुछ कदम आगे चलकर भगवान आदि गणेश की सिर विहीन मूर्ति दृष्टिगोचर होती है। मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुडयों वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल सुशोभित है। जहां से दिव्य जल की बूंदें टपकती हैं। मुख्य बूंद तो श्री गणेश के गले में पहुंचती है जबकि पंखुडयों से बाजू में टपकती है। पूर्व में यही जल अमृत हुआ करता था। थोडा आगे चलकर भगवान केदारनाथ भैंसे के पादपृष्ठ रूप में अवस्थित हैं। उनके बगल में ही
बद्रीनाथ  जी विराजमान हैं। ठीक सामने बद्री पंचायत बैठी है जिसमें यम-कुबेर, वरुण, लक्ष्मी, गणेश तथा गरुड महाराज शोभायमान हैं। बद्री पंचायत के ऊपरी तरफ बर्फानी बाबा अमरनाथ की गुफा है तथा पत्थर की बडी-बडी जटाएं फैली हुई हैं। यहां आगे बढते ही काल भैरव की जीभ के दर्शन होते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो भी मनुष्य काल भैरव के मुंह से गर्भ में प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाये तो उसे अवश्यमेव मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इसी के समीप त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु- महेश तथा महेश्वर सुशोभित हैं। उनके बगल में भगवान शंकर की झोली यानी भिक्षा पात्र तथा बाघम्बर छाला के दर्शन होते हैं।

👉🏿यहां से चन्द कदम आगे बढते ही धर्म द्वार के पास पाताल चन्द्रिका विराजमान है जो पाताल देवी तथा पाताल भुवनेश्वरी के रूप में पूजित एवं प्रतिष्ठित है। मां भुवनेश्वरी के बगले में शेर का मुंह अलंकृत है। बाईं तरफ मुडकर देखने पर मोक्ष, धर्म, पाप तथा रणचार द्वार आते हैं। पौराणिक मान्यतानुसार रण द्वार द्वापर युग में  जबकि पाप द्वार त्रेता युग में बंद हो गया । कलयुग के अन्तिम चरण में धर्म का द्वार बंद रहता है तथा मोक्ष का द्वार सतयुग में बन्द रहता है। पौराणिक कथाओं में इनका विस्तार से वर्णन आता है।
चार द्वारों के साथ ही द्वापर युग का प्रतिरूप पारिजात वृक्ष सुशोभित है। इसेदेखने से ऐसा जान पडता है मानो सम्पूर्ण भूमण्डल का भार इसने अपनी मजबूत शाखाओं में उठा रखा हो। जनश्रुति के मुताबिक वर्तमान में परिजात का एकमात्र वृक्ष बाराबंकी जनपद के रामनगर तालाब के किनारे देखा जा सकता है। भूण्डल में और कहीं भी यह पवित्र वृक्ष नहीं है।

👉🏿 पौराणिक प्रसंग के अनुसार योगीराज भगवान श्रीकृष्ण स्वर्गलोक स्थित अमरावती से इस वृक्ष को लोक कल्याण के निमित्त पृथ्वी पर लाये थे। द्वापर काल में यही वृक्ष तब कल्पवृक्ष के नाम से जाना जाता था जबकि कलयुग में यह पारिजात वृक्ष के रूप में पूजित एवं अभिसेवित है। कहा जाता है कि इस वृक्ष पर प्रति दिन रात्रिकाल में श्वेत वर्ण का सिर्फ एक पुष्प खिलता है जो प्रातः अरुणोदय से पूर्व झड जाता है। जिस किसी को यह फूल मिल जाता है उसके सभी रोग-शोक, कष्ट-क्लेश मिट जाते हैं और सांसारिक मायाचक्र से धीरे-धीरे बाहर निकल मुक्ति मार्ग पर चलने का अधिकारी हो जाता है।

👉🏿इस चमत्कारिक गुफा के स्वरूप तथा रहस्य को शब्दों में समेटना सहज नहीं है। फिर भी धर्म प्रेमी जिज्ञासु इसके भीतर अंकित तथा चित्रित देवाकृत्रियों के दर्शन कर समय-समय पर अपनी समझ एवं सामर्थ्य के अनुसार इसके अलौकिक रहस्य को लोक कल्याणार्थ शब्द देने का प्रयास करते आ रहे हैं। 

👉🏿पाताल भुवनेश्वर गुफा से ही वृंदावन स्थित कदलीवन के लिए मार्ग जाता है। कदलीवन यानी केले के पेडों से पुष्पित, पल्लवित तथा सुशोभित एक ऐसाविलक्षण वन जो भगवान सत्यनारायण की माया से निर्मित बताया जाता है। भूतल पर हयी एकमात्र ऐसा स्थान है जो श्री हनुमान जी को सर्वाधिक प्रिय है। इसको लेकर पौराणिक कथाओं में अनेक रोचक व ज्ञानवद्धर्क प्रसंग मिलते हैं। एक कथा प्रसंग के अनुसार एक बार युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर भीम कदली वन में ब्रह्मकमल तोडने निकले। कहते हैं कि भीम को अपने बल पर गर्व होने लगा था। हनुमान जी चूंकि भीम से अत्यधिक स्नेह रखते थे, उन्हें लगा कि भीम का यही गर्व उसके पतन का कारण बन जायेगा। इसलिए अहंकार के दलदल से उनको बचाना होगा, इसी भाव को लेकर हनुमान जी भीम के रास्ते में पूंछ फैलाकर लेट गये। भीम ने हनुमान जी से पूंछ हटाने तथा रास्ता देने का अनुरोध किया तो हनुमान जी ने कहा पूंछ हटा लो और निकल जाओ। भीम पूंछ हटाने लगे किन्तु सम्पूर्ण शक्ति लगाने के बाद भी वे उसे हिला तक न सके। भीम का सारा गर्व चूर-चूर हो गया। हनुमान जी उठे, सस्नेह भीम को गले लगाकर बोले, ’’मैं सदैव तुम्हारा कल्याण चाहता हूं।‘‘महान ऋषियों की तपस्थली भी इसी पवित्र गुफा में है। कन्दरायें बनी हुई हैं। भृंगु ऋषि, दुर्वाशा ऋषि, मार्केण्डेय ऋषि तथा विश्वकर्मा आदि ऋषियों ने यहीं तपस्या की थी। कामधेनु गाय का थन भी यहीं सुन्दर शिला खण्ड में बना हुआ है जहां से जल की बूदें एक निश्चित समयान्तराल में झरती रहती हैं। बताया जाता है कि पूर्व काल में यहांदूध की धारा सतत प्रवाहित रहती थी, जो ठीक नीचे ब्रह्मा जी के पांचवें सिर पर गिरती थी, अब वर्तमान में जल से ही इस पंचानन का अभिषेक होता है। पौराणिक कथानुसार पांच मुख वाले सृष्टि नियंता ब्रह्मा जी क पहला सिर बद्रीनाथ धाम में है, दूसरा सिर गया में, तीसरा पुष्कर राज में, चौथा सिर जम्मू-कश्मीर प्रांत के रघुनाथ मंदिर में है तथा पांचवां सिर यहां पाताल भुवनेश्वर में है। सम्पूर्ण भूमण्डल में ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर राजस्थान प्रांत के पुष्कर में स्थित है। लेकिन उनकी पूजा का विधान कहीं भी नहीं है।
ब्रह्मा जी के इन पांचों स्थानों पर पितरों का श्राद्ध कर्मध्तर्पण करना बहुत महत्व रखता है। पितृ पक्ष से संबंधित श्राद्ध कर्म बद्रीनाथ धाम में, मातृ पक्ष से सम्बन्धित श्राद्ध कर्म पवित्र गया धाम में, भातृ पक्ष वाले कर्म पुष्कर में तथा ननिहाल पक्ष वाले श्री रघुनाथ मंदिर धाम में करना श्रेष्ठकर माना जाता है। जबकि पाताल भुवनेश्वर में सभी पक्षों से संबंधित श्राद्ध कर्म तथा तर्पण आदि किये जाते हैं व चमत्कारिक फलदायी माने जाते हैं। यहां छूटे हुए श्राद्ध उठाये भी जाते हैं। अमावस्या के मौके पर तर्पण विशेष महत्व रखता है। यदि ब्राह्मण न हो तो पुजारी से भी उक्त कर्म करा लिये जाते हैं।
चमत्कारिक सप्त जल कुण्ड भी इसी गुफा में अवस्थित है। छह कुण्ड तो बंद यानी ढके हुए हैं।

👉🏿कुछ मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने क्रोध के आवेश में गजानन का जो मस्तक शरीर से अलग किया था, वह उन्होंने इस गुफा में रखा था। दीवारों पर हंस बने हुए हैं जिसके बारे में ये माना जाता है कि यह ब्रह्मा जी का हंस है। गुफा के अंदर एक हवन कुंड भी है। इस कुंड के बारे में कहा जाता है कि इसमें जनमेजय ने नाग यज्ञ किया था जिसमें सभी सांप जलकर भस्म हो गए थे । इस गुफा में एक हजार पैर वाला हाथी भी बना हुआ है।

👏👏 आभार -
श्री गिरिराज सिंह जी लोटवाडा ,
श्री रुद्रप्रताप सिंह जी सिसोदिया,
कृष्णपाल सिंह जी ( के.पी.सिंह जी ), श्री विजयपाल सिंह जी (वी. पी . सिंह जी ) , श्री गणपत सिंह जी राठौड़ , श्री रविन्द्र सिंह जी चिंडालिया , ठाकुर ओमप्रकाश सिंह जी मुम्बई , श्री उम्मेद सिंह जी कुली- खाचरियावास , श्री शक्ति सिंह जी मलारना चौड़ , श्री प्रवीण सिंह जी बाघावास , श्री मनवीर सिंह जी कैराप व समस्त सम्माननीय पदाधिकारी व सदस्य - अखंड राजपुताना सेवा संस्थान , दिल्ली ।

👏 शिव सिंह भुरटिया

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